थारून्के पोशाक ओ गरगहना

प्रकृति–पुरूष ई धरती पर स्त्रीलिंग ओ पुलिंग दुई मेरके मनुष्यके संरचना कैले बा । ई दुनु लिंगी आदि अनादि कालसे ई जगतमें एक दूसरेक परिपूरक बनके प्रेमालाप करती ई भौतिक संसारमें जीवन रूपी गाडी चलाईटटाँ । बात यहाँ आइल लिंग भेदके अनुसार पोशाकके । यहाँ विद्वान लेखक लोग ई शब्द हे अपन–अपन अलग–अलग ढंगके, शैलीमें परिभाषित कैले बटाँ । मे मैं यहाँ छोट बुद्धिक जीव ई शब्द हे ई मेरके केराइटुँ–“मनुष्य जीवनके हरेक महत्वपूर्ण अवस्थामें पहिरक लग जातिगतके, कुल धर्मके अनुसारसे कारीगढ द्वारा सामाजिक मान्यता प्राप्त ‘तन’ में लगाईक लग बनल परिधान हे पोशाक कठाँ ।” यहाँ दाङ देउखर लगायत पच्छिउँ जिल्लक आदिवासी थारू जातिके पुरूष ओ महिलाके पोशाकके बारेमें वर्णन कै जाइटा ।

१. पुरूषके पोशाकः समयके फेरबदलके अनुसार पुरूषके पोशाक हे दुई वर्गीकरण में विभक्त कैना उचित देखटुँ ।
(क) अतीतकालीन पोशाक
(ख) आधुनिक पोशाक
(क) अतितकालीन पोशाकः थारू जातिके पोशाक नेपाली समाजमें एक अलग ही महत्व राखठ । कृषि प्रधान देशके कृषि पेशामें लागल रलक ओरसे साधारण जीवन यापन करक लग साधारण चौबन्डी झुल्वा, भेग्वा जैसिन पोशाक अपनैंले रहिंट ।

(ख) आधुनिक पोशाकः यी पोशाक में पाश्चात्य सभ्यता एवं फैसन शो घर कैले बावै । तमाम विकृति पैदा हो गैल बा । युवक लोग टे सुटेट बुटेट ओ ऐनक घोडी रबे करठाँ । इहोंर मनचले अद्र्धवयस्क लोग फेन यी पोशाक घालेसे बाँकी नैं रखठाँ । उहे से आजके जमानामें थारू जाति ओ अन्य जाति, झट्टे छुट्याई सेक्ना मुश्किल पर जाईठ ।

अतीत कालीन पोशाकके अच्छाईः थारू जाति वर्षभर प्रायः कृषि कार्यमें लागल रलक ओरसे परम्परागत पहिरन अथवा पोशाकके ज्यादा सुबिधा जनक रहिन् । काहेसे हँसिया, थैलीक माखुर, बक्सक कूँजी, बसिया आदि करधूनमें झूँराईटहिंट । यकर अतिरिक्त भेग्वा (अँगुच्छा) से एक लंगोटाके काम आइटिहिन्, जोकि अण्ड बृद्धि (हाइड्रोशील) के रोगसे बँचाईटहींन् । ई पोशाक संयमित जीवनके लग सहायक रहिन् ।
अतीत कालीन पोशाकके खराबीः आजके प्रगतिशील मानववादी युगमें यी पोशाक बेपर्दगी ओ असभ्य समाजके पहिरन् मानत रहिंट । यिहे ओरसे थारू जाति उच्च ओ सभ्य समुदायके समक्ष अपन हे हीन भावना महसुस करत रहिंट ।

आधुनिक पोशाकके अच्छाईः समयके माग अनुसार अपनहे बदलना बरा जरूरी रहठ । भेष–भूषाके सर्वागींर्ण विकासके साथ–साथ अन्य विकसित समुदायके समक्ष होके चल्ना फेन हौसला बह्रठ ।

आधुनिक पोशाकके खराबीः विकसित देशमें ज्यादातर मशीनसे खेतीपाती कैना हुइलक ओरसे उहाँक लिए ठिके बटिन् । लेकिन् हमार नेपाल हस अद्र्ध्विकसित मुलुकके लिए अभिन् पूरा–पूरा फिट नैं उट्रठ ।

यकर अतिरिक्त जन्म–जात कर्ममें, हरेक शुभ–अवसर पर पुरूष ओ महिला वर्गके लग संस्कार अनुसार, अलग–अलग मेरके पोशाक फेंन बन्वाईक परठ । जस्टे भतखौही (अन्न प्राशन) मुण्डन, विवाह, किरिया काज आदि ।

महिलाके पोशाकः

क) दाङ उपत्यकम थारू महिला के पोशाकः परम्परासे चल्टी अइलक पहिरन चोलिया, गोनियाँ ओ उज्जर झुलुवा त्यागके अब ब्लाउज ओ छीट, टेरीकाटके झोहर गोनियाँ लगाई भिंरल बटाँ । पहिलक अपेक्षा अब ई पोशाक में कुछ ठिके देख परठ । कुछ बुद्धिजीवी, धनी–मानी व्यक्ति, अपन महत्व दर्शाइकलग नेपाली पोशाकमें फेन अपन जन्नीन् रख्ठाँ ।

ख) देउखर उपत्यकम थारू महिला के पोशाकः वयस्क लर्कीक् भोज हुइलक बाद, अँचरही से महिला वर्ग में प्रवेश करठाँ । एईनके जातिगत संस्कार फेन पुरूषहस हो । लेकिन भोज ब्याहके अवसर पर सूजी (दर्जी) द्वारा एकदिन, बिशेष मेरीक पोशाक तयार करवाईल जाईठ । जेम्ने कुर्ठा, गल्टक लहँगा पहिराके चुनरिया, फरिया ओ घुरघुट फेन ओह्राईल जाईठ । यकर साथ–साथ श्रृंगार, प्रशाधन द्वारा विशेष रूपसे सिंगारल जाईठ ।

आजकल सामाजिक अवहेलनाके दृष्टिकोणसे महिला वर्ग ई पुरान भेष–भूषा अथवा पोशाक नै राखे लग्लाँ । यिहे ओरसे यम्ने ह्रास आइता ।
यिहे परिप्रेक्ष में, हिन्दु धर्मावलम्बीन् के सती प्रथा तोडेवाले भारतके राजा राममोहन रायके राजसी पोशाकसे, हमार थारू जातिन् के दुल्हक पोशाक फेंन बहुत कुछ मिलठ–जुलठ । अस्टेक नन्हे हमार विश्व समुदायमें फेंन आ–अपन देशके शाही पोशाक, राजसी पोशाक, मिलिट्री पोशाक इत्यादि फेंन रहठ ।

गहनाः यी प्रकरण में पहिले कुछ समाग्रीक् वारेमें चर्चा कै लेना ज्यादा सान्दर्भिक सम्झटुँ । हमार देश नेपाल में भूगर्भिक सम्पदा प्रशस्त मात्रामें बा । जेम्ने सोना, चाँदी, तामा, पित्तर, रांगा, जस्ता, लोहा, कोइला आदि । लेकिन यी सम्पत्ति देश गरीब हुइलक ओरसे धातु्क् खोडाईक काम नगन्य हस बावै । पुरान् बुढा–पाखा मनैंन से ईहे सुन जाईठ– आगे देउखर के रापती लडियक रेटवा मन् खोनवन् बालुमन सोना, चाँदी चाँनिट । यदा कदा अभिन् फेंन कहुँ–कहु सुन मिलठ लेकिन अब यी जाति यहाँ से डोसर ओर सर गैलाँ । बर्दियम सोनहा जाति अभिन बगरवम सोेन चन्ठाँ । यइनके रहन सहन ढेर हद सक थारून्से मिलठ । पुर्खन्के पालामन् प्रायः हमार नेपाली सोलारन् के बनाईल गहना प्रति ओटना आस्था ओ शुद्धताके विश्वास नैं रहींन्, जत्ना कि भारतीय सोलार पर ।

भारत सोना उत्पादन में डोसरा स्थान राखठ । यिहे ओरसे प्राचीन भारत “सोनेकी चिडिया” के नामसे फेन प्रसिद्ध रहे । आधुनिक युगमें टे आउर सोनक आभूषणके लग अन्तर्रा्ष्ट्रिय कम्पनी खुल गैल बा । बरे–बरे ज्वैलर्स बा । आधुनिक फैशन्के लग डिजाईन प्रविधि सम्बन्धी विश्वविद्यालय फेंन खुल गैल बा । जेकर कारण सोना, चाँदी, हीरा, जवाहरात आदि रत्न जडित् आभूषण बडे पैमाना पर अन्तर्रा्ष्ट्रिय बजार में करठ । लेकिन हमार हस अद्र्ध्विकसित मुलुकमें, राजधानी तथा बरे–बरे नगरमें मात्र कुछ ज्वैलरीके दुकान देख परठ । एयरपोर्ट भन्सारमें प्रायः यिहे सुनबो कि आज इतना सोना, चाँदी टे काल्ह उतना सोना, चाँदी पकरल गैल ।

जब अपनें देशमें आभूषणके लग पर्याप्त मात्रामें धातु उपलब्ध हूईट टे, का करे डोसर देशसे इस्मग्लिङ कैके नानक परट ।आगे देउखर, दाङमें भारतीय सोलार कुछ बडा जिम्दार, कटकन्दारके यहाँ बैठके हमार देउखरके थारू जातिन्के गहना बनाईंत रहिंट । बडा मनैंनके यहाँ बैठलक ओंरसे एइन्के फेंन संरक्षता हूइट रहींन् । ओइन हे मलिकवक डाँट से फेंन कौनो गलत काम नैं करत रहिंट ।

उदाहरणस्वरूप– गोबरडिहा, नर्ती, सिसहनियाँ, बगरापुर आदि ठाउँ में गहना बनाईंट । यइनेन्के बनाईल गहना हमार यहाँक चाड–पर्व, संस्कार, भोज–व्याह आदिके समयक, जातिगत श्रृंगारके आभूषणके समस्या हल हुइटहे ।

वर्तमान समयमें बिदेशी लोग हमार उपत्यकासे हरेक प्रकारके धूर्तता कैके सीधा, साधा पुरूष ओ महिलासे सब गहना बदल–बदल अथवा खरीदके लैजाइटटाँ । यिहे ओरसे आज हम्रे किमती गहनासे वञ्चित हुइटी जाईटी । यी वैभवहे बचाईक लग थारू सब चेतनशील हुइना चाही । यकर साथ–साथ सरकारी तथा गैरसरकारी संस्था, समुदाय फेंन यी तरफ बिशेष ध्यान देना चाही । काश ! कोई यकर संरक्षण के लग कदम उठाए । साभारः जीव लाल के फूलरिया २०६७